बरसों से कर रहा हूँ एक प्रयास
कोई आदमी मिले
मिला आदमी जैसा एक अनायास
मैं खुश हुआ
लपक कर बढ़ाया हाथ
शायद वह दे दे मेरा साथ
उसने भी मिलाया हाथ
और फेंकी एक मुस्कान
पूछा बेतकल्लुफी से
तुम कौन हो मेरी जान
मैं थोड़ा सा घबराया
थोड़ा सा चकराया
यह आदमी मुझे
क्यूँ नहीं पहचान पाया
मैं हूँ आदमी बिलकुल तुम्हारी तरह
मैंने उसे समझाया
मुझे तुम्हारा संग चाहिए
अपनी बातों से सहलाया
ऑंखें उसकी फ़ैल गयीं
पेशानी पे पड़ गया बल
यह कैसे हो सकता है
तुम रहो आदमी केवल
झूठ मत बोलो
मुझे बर्गलाना आसान नहीं
सिर्फ आदमी होना कोई पहचान नहीं
तुम हिन्दू हो या मुसलमान
सिख हो या क्रिस्तान
तुम्हारा धर्म क्या है
देखो मत बनो अनजान
अभी ठहरो मेरे प्रश्न हैं अधूरे
कुछ और है पूछना
तब होंगे पूरे
तुम ब्राह्मण हो या चमार
शहराती हो या गंवार
यही आदमी का सच है
बाकी सब है बेकार
उसके इतने प्रश्न सुन
सोचने लगा
आदमी क्या से क्या हो गया
कई आवरण में सिमट कर
लघु से लघुतर हो गया
पद हो गया आदमी से बड़ा
कद हो गया आदमी से बड़ा
धर्म हो गया आदमी से बड़ा
जात हो गया आदमी से बड़ा
और आदमी के इर्द-गिर्द
होता गया खोल सख्त कड़ा
यहीं नहीं रुका है आदमी
और भी कई बातें हुईं हैं
उजाले दिन ख़त्म हुए
काली स्याह रातें हुईं हैं
प्रेम मिलन का नहीं रहा है मर्म
कीमत ले जोड़ा बनाना हो गया है कर्म
आदमी का आदमी से मिलने का दाम है
हर रिश्ते को पैसे में तोलना उसका काम है
आदमी आदमी से ना सिर्फ कट गया है
वह खुद टुकड़ों टुकड़ों में बंट गया है
अपने आवरण को फाड़ो
लाओ एक नया विहान
सोचो वह क्षण कैसा होगा
जब तुम्हे होगी आदमी की पहचान
पहले बदलो खुद को
फिर औरों को सोचना
संत ज्ञानियों का
पाया यही है कहना
फिर भी हो सकता है यारों
लोग नहीं बदलेंगे
अकेले ही रास्तों पर तब हम
चल देंगे चल लेंगे।
कोई आदमी मिले
मिला आदमी जैसा एक अनायास
मैं खुश हुआ
लपक कर बढ़ाया हाथ
शायद वह दे दे मेरा साथ
उसने भी मिलाया हाथ
और फेंकी एक मुस्कान
पूछा बेतकल्लुफी से
तुम कौन हो मेरी जान
मैं थोड़ा सा घबराया
थोड़ा सा चकराया
यह आदमी मुझे
क्यूँ नहीं पहचान पाया
मैं हूँ आदमी बिलकुल तुम्हारी तरह
मैंने उसे समझाया
मुझे तुम्हारा संग चाहिए
अपनी बातों से सहलाया
ऑंखें उसकी फ़ैल गयीं
पेशानी पे पड़ गया बल
यह कैसे हो सकता है
तुम रहो आदमी केवल
झूठ मत बोलो
मुझे बर्गलाना आसान नहीं
सिर्फ आदमी होना कोई पहचान नहीं
तुम हिन्दू हो या मुसलमान
सिख हो या क्रिस्तान
तुम्हारा धर्म क्या है
देखो मत बनो अनजान
अभी ठहरो मेरे प्रश्न हैं अधूरे
कुछ और है पूछना
तब होंगे पूरे
तुम ब्राह्मण हो या चमार
शहराती हो या गंवार
यही आदमी का सच है
बाकी सब है बेकार
उसके इतने प्रश्न सुन
सोचने लगा
आदमी क्या से क्या हो गया
कई आवरण में सिमट कर
लघु से लघुतर हो गया
पद हो गया आदमी से बड़ा
कद हो गया आदमी से बड़ा
धर्म हो गया आदमी से बड़ा
जात हो गया आदमी से बड़ा
और आदमी के इर्द-गिर्द
होता गया खोल सख्त कड़ा
यहीं नहीं रुका है आदमी
और भी कई बातें हुईं हैं
उजाले दिन ख़त्म हुए
काली स्याह रातें हुईं हैं
प्रेम मिलन का नहीं रहा है मर्म
कीमत ले जोड़ा बनाना हो गया है कर्म
आदमी का आदमी से मिलने का दाम है
हर रिश्ते को पैसे में तोलना उसका काम है
आदमी आदमी से ना सिर्फ कट गया है
वह खुद टुकड़ों टुकड़ों में बंट गया है
अपने आवरण को फाड़ो
लाओ एक नया विहान
सोचो वह क्षण कैसा होगा
जब तुम्हे होगी आदमी की पहचान
पहले बदलो खुद को
फिर औरों को सोचना
संत ज्ञानियों का
पाया यही है कहना
फिर भी हो सकता है यारों
लोग नहीं बदलेंगे
अकेले ही रास्तों पर तब हम
चल देंगे चल लेंगे।
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