मेरा और उनका बस इतना सा हिसाब है
जैसे चंद पन्नों की कोई किताब है ।
मेरी गर्दन, उनका खंजर, उनका आस्तीन
अब लगे है गिरिया पहन बैठा हिजाब है।
हम आज भी हैं बुत-परस्त, वो आज भी हैं मुसल्मा
कुछ नहीं बस बालों में अपना अपना खिजाब है।
जैसे चंद पन्नों की कोई किताब है ।
मेरी गर्दन, उनका खंजर, उनका आस्तीन
अब लगे है गिरिया पहन बैठा हिजाब है।
हम आज भी हैं बुत-परस्त, वो आज भी हैं मुसल्मा
कुछ नहीं बस बालों में अपना अपना खिजाब है।
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