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Sunday, December 23, 2012

मैं कविता कैसे लिख सकता हूँ

उसने पूछा
मैं कविता कैसे लिख सकता हूँ

क्षण भर मैं चकराया
और थोडा भरमाया
क्या तुम नहीं समझती
मन के भाव को
क्या तुम नहीं समझती
शब्दों के अभाव को
जो व्यक्त कर सकें
मानव मन और जीवन के
कटाव को

कविता एक अभिव्यक्ति है
मन को मन से जोड़ने की
शक्ति है
अपने में समेटे
हृदय को व्यथा
और ना जाने
कितने जीवनों की कथा
कैसे मैं कहूँ
मैं कविता कैसे लिख सकता हूँ

इंसानी भावना की डोर का
ना पता हो जिसके
इस या उस छोर का
कविता वहीँ तो जन्म लेती है
कैसे उस डोर को पिरोना है
शायद इसी बात का तो रोना है
कविता वहीँ जन्म लेती है

कविता एक लड़ी है
बाल मन के उछ्रिन्खल्ताओं  की
एक वयस्क मन के
सोच की गहराइयों की
एक बूढ़े मष्तिष्क की
चंचलताओं की
इन तीनो का समन्वय
एक धागे में इनका विलय
वही तो कविता है

आकार देती है
अनछुई सोचों को
जो मेरे शब्दों से परे हैं
गांठ में बंधे
कहीं धरे हैं
जुबान पे जिसका जिक्र नहीं
लेखनी को इसकी फिक्र नहीं
वह तो अनवरत प्रस्तुत करती है
मन के भावों को
उसकी किलकारियां और
उसके घावों को
कैसे मैं कहूँ
मैं कविता कैसे लिखता हूँ।

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