यों तो आए दिन
छपती हैं अख़बारों में तस्वीरें
मैंने कल है जिसे देखा
उसकी छुपी इबारते
बता रही हैं भावी तकदीरें
वह महज एक चित्र था
मगर उसमे छुपा भावी हिंदुस्तान
बड़ा विचित्र था
एक अधटूटा
और अधजला मकान
पृष्ठभूमि में पसरी थी
एक शैतानी मुस्कान
खंडहर में तब्दील
उठ रही थीं आग धुंए की लपटें
चहुँ दिशा कर रहीं अट्टहास
मनुष्य की कपटें
वहीँ थीं दो लाशें
एक अधजली
और दूसरी भली चंगी
पंचतत्व में विलीन नहीं
मगर अधनंगी
दोनों ही थीं लाशें
दोनों में एक बड़ा फर्क था
दंगाइयों के दिमाग में
उनके लिए अलग अलग तर्क था
अधनंगी लाश थी मर्द की
वह सिर्फ विधर्मी या काफ़िर था
उसका क्या इस्तेमाल आखिर था
सीधे आग में झोंक दिया
धर्म का खंजर इंसानियत को भोंक दिया
दूसरी लाश औरत थी
उसके दो पाप थे
उसपर पुरुष और धर्म के
अभिशाप थे
पहले उसका प्रथम पाप
औरत होने की सजा भोगें आप
धार्मिक पुरुष जोश में भरा
इंसानियत मदहोश हो मरा
औरत मर गयी
अब थी वह जिन्दा लाश
धार्मिक पुरुष को लगी
उसके रक्त की प्यास
अब धर्म का ख्याल आया
इश्वर को बलि भेंट देने का
सवाल आया
प्रथम औरत औरत थी
दूसरी महज विधर्मी जीव
उसे फिर मरना था
अब उसका कोई इस्तेमाल नहीं था
जिन्दा रहने का कोई सवाल नहीं था
दो बच्चे
अधनंगे
इन तमाम दृष्यों के चश्मदीद गवाह
ठहर गया है सरिता का प्रवाह
उनके चेहरे पर कुछ नहीं
ख़ुशी नहीं
उदासी नहीं
बिलकुल सपाट
जीवन भाग गया है
खोल सभ्यता के कपाट
आँखों में कुछ नहीं
अपलक
सामने के नज़ारे शुन्य
चाँद और सितारे शुन्य
नदियाँ शुन्य, हवाएं शुन्य
पेड़ पौधे और फिजायें शुन्य
आँखों की चमक शुन्य
चेहरे की दमक शुन्य
इच्छाओं की ललक शुन्य
संवेदनाओं की महक शुन्य
शुन्य भी शुन्य
सबकुछ शुन्य
भावी पीढ़ी शुन्य
भावी भारत शुन्य
और अधजला मकान
पृष्ठभूमि में पसरी थी
एक शैतानी मुस्कान
खंडहर में तब्दील
उठ रही थीं आग धुंए की लपटें
चहुँ दिशा कर रहीं अट्टहास
मनुष्य की कपटें
वहीँ थीं दो लाशें
एक अधजली
और दूसरी भली चंगी
पंचतत्व में विलीन नहीं
मगर अधनंगी
दोनों ही थीं लाशें
दोनों में एक बड़ा फर्क था
दंगाइयों के दिमाग में
उनके लिए अलग अलग तर्क था
अधनंगी लाश थी मर्द की
वह सिर्फ विधर्मी या काफ़िर था
उसका क्या इस्तेमाल आखिर था
सीधे आग में झोंक दिया
धर्म का खंजर इंसानियत को भोंक दिया
दूसरी लाश औरत थी
उसके दो पाप थे
उसपर पुरुष और धर्म के
अभिशाप थे
पहले उसका प्रथम पाप
औरत होने की सजा भोगें आप
धार्मिक पुरुष जोश में भरा
इंसानियत मदहोश हो मरा
औरत मर गयी
अब थी वह जिन्दा लाश
धार्मिक पुरुष को लगी
उसके रक्त की प्यास
अब धर्म का ख्याल आया
इश्वर को बलि भेंट देने का
सवाल आया
प्रथम औरत औरत थी
दूसरी महज विधर्मी जीव
उसे फिर मरना था
अब उसका कोई इस्तेमाल नहीं था
जिन्दा रहने का कोई सवाल नहीं था
दो बच्चे
अधनंगे
इन तमाम दृष्यों के चश्मदीद गवाह
ठहर गया है सरिता का प्रवाह
उनके चेहरे पर कुछ नहीं
ख़ुशी नहीं
उदासी नहीं
बिलकुल सपाट
जीवन भाग गया है
खोल सभ्यता के कपाट
आँखों में कुछ नहीं
अपलक
सामने के नज़ारे शुन्य
चाँद और सितारे शुन्य
नदियाँ शुन्य, हवाएं शुन्य
पेड़ पौधे और फिजायें शुन्य
आँखों की चमक शुन्य
चेहरे की दमक शुन्य
इच्छाओं की ललक शुन्य
संवेदनाओं की महक शुन्य
शुन्य भी शुन्य
सबकुछ शुन्य
भावी पीढ़ी शुन्य
भावी भारत शुन्य
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