तिमिर की पुकार पर
चल पड़ा है संसार
ना है पथ पर कोई दीपक
ना हवा की है कोई दस्तक
कदम कांपते हैं, लहू जमने को है उत्सुक
बस सोचों की उड़ानें हैं
नहीं है कोई पथ प्रदर्शक
मैं खड़ा हूँ, स्पंदित हूँ
चलना मुझे भी है
पर किधर
काफिलों पे काफिले
काफिले बेशुमार
उन काफिलों में
लोग बेशुमार
एक दुसरे को धकिआते
गिरते पड़ते, पर आगे बढ़ते
जैसे चलना ही सच है
पर यह तो एक भ्रम है
चलना एक क्रम है
मंजिल तक पहुचने का श्रम है
फिर
जब मंजिल ही न दिखे
तो क्रम कैसा?
फिर और श्रम कैसा?
मानवता की पहचान कैसी?
उसकी रूपरेखा और जान कैसी?
तलबगार हूँ रौशनी का
सीने में जलने वाली
एक धौंकनी का
मैं स्पंदित हूँ।
चल पड़ा है संसार
ना है पथ पर कोई दीपक
ना हवा की है कोई दस्तक
कदम कांपते हैं, लहू जमने को है उत्सुक
बस सोचों की उड़ानें हैं
नहीं है कोई पथ प्रदर्शक
मैं खड़ा हूँ, स्पंदित हूँ
चलना मुझे भी है
पर किधर
काफिलों पे काफिले
काफिले बेशुमार
उन काफिलों में
लोग बेशुमार
एक दुसरे को धकिआते
गिरते पड़ते, पर आगे बढ़ते
जैसे चलना ही सच है
पर यह तो एक भ्रम है
चलना एक क्रम है
मंजिल तक पहुचने का श्रम है
फिर
जब मंजिल ही न दिखे
तो क्रम कैसा?
फिर और श्रम कैसा?
मानवता की पहचान कैसी?
उसकी रूपरेखा और जान कैसी?
तलबगार हूँ रौशनी का
सीने में जलने वाली
एक धौंकनी का
मैं स्पंदित हूँ।
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