लटका हुआ है शाख से
उल्टा एक बन्दर
देखे है दुनिया उलटी
एक उल्टा बन्दर
डोम को देखा उसने
बाभन के संग खाते
एक चारपाई पर बैठ
हँसते बतियाते
देखा स्त्री को उसने
एक सिंहासन पर विराजमान
आसपास थे सहचर, चाकर
और मंत्री कई महान
पुजारी की माला टूटी
मुल्ले की आवाज रूठी
इश्वर पर जन का अधिकार
खुदा बना एक नया आविष्कार
हार्दिक सौहाद्र का
दिखा एक संसार
करे है तिमिर जहां
छटपटा कर हाहाकार
पर
यकायक छ गया अन्धकार
बिजली और बादल का हुंकार
पता नहीं वह था
इंद्रा का वज्र
या कृष्णा का चक्र
या थी खुदा की क़यामत
पर कट पड़ी दुम
गिर पड़ा बन्दर
अब देखे है दुनिया सीधी
एक दुमकटा बन्दर।
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