एक मैं का टुकड़ा
कुछ सिकुड़ा सिकुड़ा
एक मैं का टुकड़ा
कुछ रुखड़ा रुखड़ा
सुरंग, लम्बी
अंत में मध्यम सी रौशनी
पथिक की वेदना
आशा और विश्वास
पथिक की चेतना
एक मैं का हिस्सा
एक तुम का किस्सा
एक मैं का हिस्सा
छुपाये दुनिया की लिप्सा
सांसों में दम
पर सुरंग का अन्धकार
भटके नहीं कहीं
सहमे हुए कदम
एक मैं का भाव
एक पथिक का भाव
एकल और पृथक
है दोनों में अभाव
दोनों भागों का मिलन
समुचित और सम्मिलित
है जीवन का आधार
शायद इसे ही कहते हैं
प्रकृति और पुरुष का जुड़ाव
कुछ सिकुड़ा सिकुड़ा
एक मैं का टुकड़ा
कुछ रुखड़ा रुखड़ा
सुरंग, लम्बी
अंत में मध्यम सी रौशनी
पथिक की वेदना
आशा और विश्वास
पथिक की चेतना
एक मैं का हिस्सा
एक तुम का किस्सा
एक मैं का हिस्सा
छुपाये दुनिया की लिप्सा
सांसों में दम
पर सुरंग का अन्धकार
भटके नहीं कहीं
सहमे हुए कदम
एक मैं का भाव
एक पथिक का भाव
एकल और पृथक
है दोनों में अभाव
दोनों भागों का मिलन
समुचित और सम्मिलित
है जीवन का आधार
शायद इसे ही कहते हैं
प्रकृति और पुरुष का जुड़ाव
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