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Thursday, January 24, 2013

वह प्रबुद्ध है

वह प्रबुद्ध है
आँखों पर
सुनहरी फ्रेम का चश्मा
चेहरे पर
रहस्यमयी दिव्य मुस्कान
मूछें कटी
करीने से
चाल में
त्रिलोकी अभिमान

पढता सुबह सवेरे
अंग्रेजी का अखबार
दि हिन्दू, दि एक्सप्रेस
पन्ने पलटते
गहन चिंतन में मग्न
हो रहा जैसे
बुद्धि और तर्क का लग्न
आज रात के भोज में
सूट कौन सा पहनना है ?
फ्रेंच शराब के कितने प्याले
मुर्गे के साथ उड़ेलना है?

सामने कांच की
चकमक मेज
कई किताबें अधखुली
कुशलता से रखी सहेज
आगंतुक की प्रथम दृष्टि में
बस आवरण अवलोकित है
झिलमिल-झिलमिल
बुद्धिमता की धाक जमती है
तिल-तिल तिल-तिल

आज उसे है
एक जुलूस में जाना
अन्याय के खिलाफ
एक आवाज है उठाना
अलमीरा से निकाला उसने
तह कर रखा
खादी का कुर्ता
खादी का पायजामा
खादी की एक बंडी
और
कलफ लगी एक गाँधी टोपी
नेता की पोशाक में
वह खूब फबता है
जिस्म से आता
इत्र का भभका है

एक गली से निकला
संग वह अपने सहचर
करने एक द्वन्द
और दूसरी गली में
सारे के सारे
हुए दृष्टिपटल से मंद

कल के अखबार में फोटो दस
प्रबुद्ध खुश
जनता खुश
सरकार खुश
अन्याय खुश
इसलिए
वह प्रबुद्ध है 

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