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Saturday, January 12, 2013

मन क्षुब्ध है

मन क्षुब्ध है
देख कर सुबह का अखबार
कई दिनों से छप रही
एक खबर बार बार
पुरुष की मर्दानगी की
एक औरत की बेबसी
और उसकी नादानगी की

15 अगस्त और 26 जनवरी के बीच
यह घटना घटी
एक हमारा अधूरा अस्तित्व
दूसरा ठिठुरता गणतंत्र
बीच में फंसी औरत
चहुँ ओर गहराता
पुरुष रचित तंत्र


 मन क्षुब्ध है
 देख कर यह उत्सुकता
 औरत शरीर पर
 अधिकार की प्रबलता
 पर
अधिकार तो हृदय पर होता है
 मन के भावों
और उद्वेलित भावनाओं पर होता है
वह तो पुरुष का लक्ष्य है
कहा उसमे छिपा
कोई यक्ष है
                           
मन क्षुब्ध है
देख
लपलपाती जीभ
चेहरे का विभत्स रूप
दुर्बल शरीर दुर्बल हृदय
चेहरे पर
तिमिर की धूप
आँखों का स्नेह भाव
होता हर पल कुरूप

और नहीं देख पाया
ऑंखें बंद की
एक तस्वीर दिखी
एक प्रकाशित कमरा
दीवालों पे टंगी
सरस्वती, राधा और सीता
बगल में कृष्ण बांचते गीता
मन फिर क्षुब्ध है

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