अक्षर बिखरे हैं
कागज पर
समेटता हूँ मैं
कागज पर
आकार देने को
एक चेहरा
एक मुस्कान
आँखों में बिखरी
काले गेसुओं की शान
और
मन को झंकृत करती
एक तान
समेटता हूँ मैं
कागज पर
आकार देने को
वह मन जो
पवित्र है
अकलुषित है
जो अलंकृत है
उन विचारों से
मिलती जिनसे मानवता को उसकी पहचान
नहीं रहता निषा का कोई निशान
उषा की पहली किरण सा
मध्यम, पर उज्जवल
सुर्ख, पर कोमल
आवेशी, पर चंचल
तूफ़ान, पर मंद
धरा, पर अनावृत
पर मेरे अक्षर
फिसल-फिसल से जाते हैं
ऑंखें बंद करता हूँ
सामने वह चेहरा आता है
खुली आँखों को
अक्षरों का फिसलना दिख जाता है
कागज पर
समेटता हूँ मैं
कागज पर
आकार देने को
एक चेहरा
एक मुस्कान
आँखों में बिखरी
काले गेसुओं की शान
और
मन को झंकृत करती
एक तान
समेटता हूँ मैं
कागज पर
आकार देने को
वह मन जो
पवित्र है
अकलुषित है
जो अलंकृत है
उन विचारों से
मिलती जिनसे मानवता को उसकी पहचान
नहीं रहता निषा का कोई निशान
उषा की पहली किरण सा
मध्यम, पर उज्जवल
सुर्ख, पर कोमल
आवेशी, पर चंचल
तूफ़ान, पर मंद
धरा, पर अनावृत
पर मेरे अक्षर
फिसल-फिसल से जाते हैं
ऑंखें बंद करता हूँ
सामने वह चेहरा आता है
खुली आँखों को
अक्षरों का फिसलना दिख जाता है
1 comment:
Thank You !!
Post a Comment