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Wednesday, January 23, 2013

अक्षर बिखरे हैं

अक्षर बिखरे हैं
कागज पर
समेटता हूँ मैं
कागज पर
आकार देने को
एक चेहरा
एक मुस्कान
आँखों में बिखरी
काले गेसुओं की शान
और
मन को झंकृत करती
एक तान


समेटता हूँ मैं
कागज पर
आकार देने को
वह मन जो
पवित्र है
अकलुषित है
जो अलंकृत है
उन विचारों से
मिलती जिनसे मानवता को उसकी पहचान
नहीं रहता निषा का कोई निशान

उषा की पहली किरण सा
मध्यम, पर उज्जवल
सुर्ख, पर कोमल
आवेशी, पर चंचल
तूफ़ान, पर मंद
 धरा, पर अनावृत

पर मेरे अक्षर
फिसल-फिसल से जाते हैं
ऑंखें बंद करता हूँ
सामने वह चेहरा आता है
खुली आँखों को
अक्षरों का फिसलना दिख जाता है 

1 comment:

swati said...

Thank You !!