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Thursday, October 20, 2016

कागजों के बीच उलझी रही है जिंदगी
सामने देख अब कहाँ बची है जिंदगी

काले शब्द सफ़ेद कागज
रंगों में अब कहाँ खेल रही है जिंदगी

याद अति हैं किस्सागोई की रातें
किस्सा सी अब बन गयी है जिंदगी

आने वाले कल के फिक्र में बीते हुए कल के जिक्र में
खिड़की के जन्गलों से झाँक रही है जिंदगी


Tuesday, September 15, 2015

मैं प्रवेश करता हूँ

रात के इस  पल में
एक ठहरे हुए कल में
मैं प्रवेश करता हूँ

यह तिमिर की  बेला
स्याह आस्मां
नीचे लाल धरा
मैं प्रवेश करता हूँ

मंजिल है दूर
रास्ता एक घना जंगल
हवाओं से खड़कते पत्ते
एकांतिक अनुभूतियों के साथ
मैं प्रवेश करता हूँ

मन में लेकर
ना कोई अवसाद
बस ठहरा है
एक ख़ास अहसास
ए साथी
तेरे मन में
मैं प्रवेश करता हूँ। 

Thursday, September 3, 2015

किस्सागो

इस शहर की मस्जिदों में क्यों मीनारें नहीं दिखती
 घर में कैद है वह तो क्यों दीवारें नहीं दिखतीं।

रास्तमिजाज है  या मेरा वहम है          (रास्तमिजाज =सच्चाई पसंद)
की नारों में उसके वह आशनाई नहीं दिखती।

तमाम उम्र साँसों में कैद रूह  छटपटाती है
आजाद ख़याल दिखते आजाद रूह नहीं दिखती। 

वक्त पर बिछ गयी है कैसी धूल कोई तो साफ़ करे
पीछे चाबी लगा कोई तो शुरुआत करे
उँगलियाँ उठने लगी हैं अब तो
ठहरा नहीं अगर तो क़दमों के निशाँ क्यों नहीं दिखते। 

किस्सागो से दिल्लगी की आदत भली नहीं     (किस्सागो= किस्सा कहने वाला)
की किस्सों से जिंदगी की राह नहीं निकलती। 

अंधेरों में आवाज लगाएं भी तो क्यूँकर
 कभी चिराग नहीं दिखता कभी जमीं नहीं दिखती।

  

Tuesday, March 17, 2015

टेसू

कविताओं के आगे पड़ाव खोजता
मैं धूप की सुनहली छाँव खोजता।

लाख छुपा कर रख मुहब्बत के नजरानों को
मैं वीराने में गुलशन-ए-बहार खोजता। 

सड़क पर खड़े दरख्तों के मानिंद जिंदगी
वे पीछे जाते मैं निशां आगे खोजता।

इस सन्नाटे से ही क्यों न दिल लगा लूँ मैं
भीड़ में कहाँ वो अब मेरी पुकार  खोजता।

हथेलियों पर रात भर जलते रहे अंगारे
मैं टेसू समझ झुलसे हाथों में रंगों के निशां खोजता। 

ना गुजरे थे ना गुजरेंगे कूचा-ए-यार से
वो खिड़की बंद कर बैठा क़दमों के आवाज खोजता।  

Wednesday, February 4, 2015

मुकाम

इन लहरों पर मुकाम देखूं
फिर साहिलों के कैसे मैं पैगाम देखूं।

हाथ आ कर फिसलती जिंदगी
अब मौत का भी पैगाम देखूं।

सोयी हुई ऑंखें ही देखती हैं सपने
खुली आँखों से जिंदगी मैं तमाम देखूं।

कौमों  के बीच मुहब्बत में क्या कमी रह गयी थी
मजलिस में मैं हिन्दू देखूं मुसलमान देखूं।

होकर मजबूर वह बढ़ता गया अकेला ही
क़दमों में उसके मैं दोनों जहान देखूं।

शाम से लेकर कलम वे बैठे हैं लिखने गजल
मैं सफ़ेद कागज़ पर उनका कलाम देखूं।

Thursday, January 29, 2015

परेड

हर वायदे पर तेरे ऐतबार कैसे करे कोई
कभी खुद से भी प्यार करे कोई।

देखता बरसों से चली आ रही नुमाइशें वह
ख्वाबों से इतना प्यार कैसे करे कोई।

एक साथ दिखाते बच्चे और बंदूकें
कोई कलम पकडे या हथियार पकडे कोई।

मौकों की तलाश में दिखती युवकों की फ़ौज
जब रास्ता ही सुनसान ना हो तो राहजनी कैसे करे कोइ।

तमन्नाओं के दलदल में पैरों को जमीन नहीं मिलती
इन्तेजार में डूबे जाते हैं की रस्सी फेंके कोई।

हर काफ़िर बतलाने लगा है खुदा का पता
नमाजियों पर अब भरोसा कैसे करे कोई।

Sunday, January 25, 2015

तेरी जुल्फों को छू कर जब बयार चली
मेरा दिल लेकर मेरे यार चली।

हम आईने से पूछते अपना ही पता
परछाइयाँ भी मेरी अब तेरे साथ चलीं।

शौक तो बहुत है दिल को मुहब्बत का मगर
किस दामन से उलझ कर जिंदगी की राह चली।

थम कर वक्त जरा बदल क्यों नहीं जाता?
हर बार इसने बस अपनी ही चाल चली।

  

पड़ाव

मन के सवालों का जवाब कहाँ मिलता
की मंजिलों से पहले पड़ाव कहाँ मिलता।

हर पेड़ छिप गया है मकानों की चादरों में
परिंदों को अब शहरों में पड़ाव कहाँ मिलता।

वो कैदी जंगले से झांकता तो जरूर है मगर
सपने और हक़ीकत के परों का विसाल कहाँ मिलता।

बड़ा पाकदामन बतलाते हैं जमाने में उसे
दामन में उसके जले ठूंठों के सिवा कुछ नहीं मिलता।

ठहरकर सोचने की आदत भी भली होती वरना
तेज भागती जिंदगी में ठहराव कहाँ मिलता।

हम आज भी तकते उस हमनशीं का रास्ता
खुदा की नमाज में अब वह सुकून कहाँ मिलता। 

Friday, January 9, 2015

थपेड़े

फ़साने कई लिखे हैं लहरों ने थपेड़ों से 
मिटा मिटा कर साहिलों की रेत थपेड़ों से।

वो जरूर दरियाओं में पनाह मांगते होंगे 
वरना कब बचे हैं सितमगर थपेड़ों से। 

वो कहते मेरी खुशमिजाजी को मेरा बचपना मगर 
उन्हें नहीं पता हम बच ना पाये उम्र के थपेड़ों से।  

वो तो उनकी आशिकी को बेदाग़ रखना था वरना 
कमजोर  हम इतने भी नहीं की लहरें मिटा दे नाम थपेड़ों से।  

रहम मांगते फिरें शख्स वे सीपियों की दुकानों पर 
लहरों ने आ पटका है जिन्हें किनारों पर थपेड़ों से। 

आसान कहाँ है शायरी में मुकाम पाना 
शायरी की जमीन पर मिट जाते कई नाम जिंदगी के थपेड़ों से।  


Tuesday, November 18, 2014

धीरे धीरे

कब रुकी है जिंदगी की कहानी धीरे धीरे
बीत गयी कुछ बीतेगी बाकि जिंदगानी धीरे धीरे

काफिले कब तक चलेंगे ऊँटों के टखनों पर
वक्त आ गया है हौसलों के पंख लगाना धीरे धीरे

खौफ हवाओं में आज भी मौजूद है अंग्रेज बहादुर का
अरे इस बार तो आजादी लाना धीरे धीरे

कई रातों की नींद बाकि है आँखों में
शायद इस बार जुड़ जाये यह तंत्र जन से धीरे धीरे

हाथ उठा है दुआ में कबूल कर ऐ खुदा
वरना कोई यह न कहे तुझे हम भूल चुके धीरे धीरे

Saturday, November 1, 2014

मकां

इस तंग मकां में तेरा रहना हाय हाय
इससे बड़ा तो मेरा दिल हाय हाय

आशिकों की बस्ती में खुदा का भी एक मकां है मगर
दरवाजे पर चुनवाई किसने यह दीवार हाय हाय

पुराने दरख़्त हैं छाया तो देंगे मगर
किसे पता कब टूट कर बिखर जाये हाय हाय

मेरे चाहने वालों ने आवाजें कितनी लगायी मगर
हम जहाँ रहते हैं वहाँ उठी ख़ामोशी की बयार हाय हाय

आज खुश हुआ हूँ तो लिखता हूँ गजल  मगर
कलम से मेरी क्यूँ टपके है लहू हाय हाय

इधर मस्जिद टूटी उधर मैकदा फूटा
खुदा के दोनों ठिकाने इंसानों ने कैसा लूटा

शबे हिज्र में भी होता रहा बहरे खुदा फ़रियाद
हमसे यारों खुदा को किसने लूटा

था आगाज ऐसा की जीस्त ने खुदा पाया
अंजाम देख कर हाथों से पैमाना छूटा

हम आज भी करते हैं खुदा तुझे दिल से याद
पर इस चक्कर में हमसे जमाना रूठा

रफ्ता रफ्ता जमाने से ग़मगुसार घटते गये
इंकलाबियों के सैलाब थे बिन बारिश छंटते गये

मजलिस लगी है भीड़ भी बहुत है
वो इमारते नहीं गरीबों के झोपड़े हैं
हवा बहती गयी वे जलते गये

शमा हर रंग में जली है सहर होने तक ग़ालिब
पर कारवां थमता गया लोग घटते गये

कितना जोर आजमां रही हवाएं देखो
चिराग तो बुझा नहीं परवाने उड़ते गये

हम वह गुल नहीं जो बादे-नौ बहार का इन्तेजार करें
की मौसम बीतते गए हम खिलते गये

Monday, October 20, 2014

बरसों बाद उनका महफ़िल में उनका नाम आया
पतझड़ के पेड़ों में हरेपन का निशाँ आया

जब उड़ेलुं तेरे पैमाने से गले में शराब साकी
बने है दिल में ग़ज़ल होठों पर तेरा नाम आया

मैकशी में अब वह मजा कहाँ रहा
की जिसने आंखों से पी उसे मयखाना कहा काम आया

हम सबा से पूछते हैं  नामबर का पता
मेह्नत ये मेरी बस पत्ते खड़काने के काम आया

Thursday, October 16, 2014

जिंदगी का फ़साना है किसने किसको जाना है
हम ने तो अब तलक कहां खुद को पहचाना है

है सांस लेती जिंदगी आगोश में मेरी
मगर सुनता हूँ मौत का अलग पैमाना है

सियासत के रखवालों से कोई कैसे बचाये जम्हूरियत को
थपेड़ों में फसी कश्ती का कहा कोई ठिकाना है

रात की हथेली पर रखे अंगारों को ताकते रह गए
और कुछ नहीं बस उनकी सोहबत  नजराना है

Wednesday, October 15, 2014

जरुरत है

पुराने टूटे चश्मे से
झांकती दो पुरानी ऑंखें
मेज के उस पार वह बैठा
मेरी बातों को था गौर से सुन रहा
डर लगा मुझे जैसे
अपने अनुभव के तराजू से
मुझे था तौल रहा

कितनी अच्छी बातें की मैंने
गावों का समुचित विकास
रोजगार होगा लोगों के पास
प्रधानमन्त्री की जनधन
अब नहीं रह जायेगा कोई निर्धन

हर बात सुन
उसकी आँखों की चमक बढ़ती गयी
और पेशानी पर पड़ी लकीरें
धीरे धीरे घटती गयीं

आश्चर्य!

बीते सालों में उसने कितनों को सुना होगा
नयी बातें नए आश्वासन
कितनी ही बार भुना होगा
फिर भी आँखों की चमक बाकी है
कुछ  करने की ललक बाक़ी है
मेरे निराशावादी होने पर भी
वह कितनी आशाओं से भरा है
अपनी नहीं पर भावी पीढ़ी के
सुखद जीवन के अहसास से दबा है

इतने वर्षों के सरकारी थपेड़ों से
वह नहीं है टूटा
इस तंत्र से वह नहीं है रूठा

तो शायद मुझे
खुद बदलने की जरुरत है
और शायद उसने ही दिया
इसका मुहूर्त है।

कुछ बात बने

चले आओ की फिर कुछ बात बने
आँखों में रात बने दिल से दिल का साथ बने

विकास की लम्बी चादर लिए मैं खड़ा हूँ
अपने को करीब तो लाओ की कुछ बात बने

मेरी सच्चाई को समझने की कोशिश छोड़
खुद को समझ जाओ तो कोई बात बने

सडसठ सालों से रेंगते हुए मेरे पास न पहुंचे
जो कछुए की केंचुल उतारो तो कुछ बात बने

जितनी दूर रहोगे उतने खतरे में पाओगे खुद को
कहीं जनता का गुस्सा
कहीं नक्सलवादी
आतंकवादी या उग्रवादी
जो चादर में आ जाओ तो कुछ बात बने

हैं लोग सोये हो तुम भी सोये
अब भी जाग जाओ तो कुछ बात बने

मैं रूह तुम जिस्म मैं हकीकत तुम तिलस्म
जो मुझ में समां जाओ तो कुछ बात बने 

Monday, May 26, 2014

दूर तलक जाएगी

मेरी उसकी बात है दूर तलक जाएगी
कभी इस फलक जाएगी कभी उस फलक जाएगी।

इस शराब की बेवफाई का  क्या कहना
कभी इस हलक जाएगी कभी उस हलक जाएगी।

रात की बात अब मत कर मेरे दोस्त
कभी इस पलक जाएगी कभी उस पलक जाएगी।

ये समझ ले मेरे दोस्त की यह मुसीबत की घडी
कभी मुझे झलक दिखलाएगी कभी तुम्हे झलक दिखलाएगी।

तेरे जाने के बाद न बदलेगा कुछ खास बस
रात अकेली आएगी रात अकेली जाएगी।

प्यार की इस खुशबु को मत छोड़ना खुला
कभी तेरी सांस महक जाएगी कभी मेरी सांस महक जाएगी।

Tuesday, May 13, 2014

कुछ पंक्तियाँ

जीवन के कुछ बसंतो का यह खयाल है
मेरी जिंदगी कि चाल कुछ तो बेमिसाल है।

धर्म जाति के टुकड़ो पे बंटा
जाने किस किस छुरी पर मेरी गर्दन हलाल है।

मेरा इश्वर, तुम्हारा अल्लाह उसका क्रिस्तान
एक हैं रूप पर कितने बवाल हैँ ।
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जिक्र है मेर आज उसकी महफ़िल में
है नहीं कोइ होश मे उसकी महफ़िल में।

लिख रख है रक़ीबो मे उसने नाम मेरा
वर्ना क्यूँ उछला नाम उसकि महफ़िल में।
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जान की आशनाई साँसों की बेवफाई
हर पल क्यों न उगले मेरी कलम रौशनाई।
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 जिक्र हुआ फिर उनका जमाने के बाद
पिटारा खुला मेरा कुछ यूँ जमाने के बाद।

ऑंखें नम होठों पर एक नाम
गम मेरा कम न हुआ जमाने के बाद।
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Thursday, January 2, 2014

खूबसूरती

 सोचा था 
पहली  के बाद 
लिखूंगा एक कविता 
पर मैंने पाया तुम्हे शब्दों के परे 
शब्द तो सीमित हैं, तुम अनंत 
तुम्हे लिख दंगा तो एक अपमान होगा 
तुम्हारी खूबसूरती का बस एक नाम होगा 

उसे मैं एक नाम कैसे दूं 
वह तो कई रूप में 
बहती मेरी आँखों के  सामने 
कभी हंसती हुई 
कभी शर्म से भरी 
कभी आलस्य में लिपटी 
कहीं गुस्से से जली 

पर हर रूप में 
वह मेरी आत्मा तक पहुँचती है 
तम्हे अपना साथी बनाने पर 
मजबूर करती है