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Tuesday, May 13, 2014

कुछ पंक्तियाँ

जीवन के कुछ बसंतो का यह खयाल है
मेरी जिंदगी कि चाल कुछ तो बेमिसाल है।

धर्म जाति के टुकड़ो पे बंटा
जाने किस किस छुरी पर मेरी गर्दन हलाल है।

मेरा इश्वर, तुम्हारा अल्लाह उसका क्रिस्तान
एक हैं रूप पर कितने बवाल हैँ ।
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जिक्र है मेर आज उसकी महफ़िल में
है नहीं कोइ होश मे उसकी महफ़िल में।

लिख रख है रक़ीबो मे उसने नाम मेरा
वर्ना क्यूँ उछला नाम उसकि महफ़िल में।
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जान की आशनाई साँसों की बेवफाई
हर पल क्यों न उगले मेरी कलम रौशनाई।
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 जिक्र हुआ फिर उनका जमाने के बाद
पिटारा खुला मेरा कुछ यूँ जमाने के बाद।

ऑंखें नम होठों पर एक नाम
गम मेरा कम न हुआ जमाने के बाद।
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