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Wednesday, October 15, 2014

कुछ बात बने

चले आओ की फिर कुछ बात बने
आँखों में रात बने दिल से दिल का साथ बने

विकास की लम्बी चादर लिए मैं खड़ा हूँ
अपने को करीब तो लाओ की कुछ बात बने

मेरी सच्चाई को समझने की कोशिश छोड़
खुद को समझ जाओ तो कोई बात बने

सडसठ सालों से रेंगते हुए मेरे पास न पहुंचे
जो कछुए की केंचुल उतारो तो कुछ बात बने

जितनी दूर रहोगे उतने खतरे में पाओगे खुद को
कहीं जनता का गुस्सा
कहीं नक्सलवादी
आतंकवादी या उग्रवादी
जो चादर में आ जाओ तो कुछ बात बने

हैं लोग सोये हो तुम भी सोये
अब भी जाग जाओ तो कुछ बात बने

मैं रूह तुम जिस्म मैं हकीकत तुम तिलस्म
जो मुझ में समां जाओ तो कुछ बात बने 

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