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Wednesday, October 15, 2014

जरुरत है

पुराने टूटे चश्मे से
झांकती दो पुरानी ऑंखें
मेज के उस पार वह बैठा
मेरी बातों को था गौर से सुन रहा
डर लगा मुझे जैसे
अपने अनुभव के तराजू से
मुझे था तौल रहा

कितनी अच्छी बातें की मैंने
गावों का समुचित विकास
रोजगार होगा लोगों के पास
प्रधानमन्त्री की जनधन
अब नहीं रह जायेगा कोई निर्धन

हर बात सुन
उसकी आँखों की चमक बढ़ती गयी
और पेशानी पर पड़ी लकीरें
धीरे धीरे घटती गयीं

आश्चर्य!

बीते सालों में उसने कितनों को सुना होगा
नयी बातें नए आश्वासन
कितनी ही बार भुना होगा
फिर भी आँखों की चमक बाकी है
कुछ  करने की ललक बाक़ी है
मेरे निराशावादी होने पर भी
वह कितनी आशाओं से भरा है
अपनी नहीं पर भावी पीढ़ी के
सुखद जीवन के अहसास से दबा है

इतने वर्षों के सरकारी थपेड़ों से
वह नहीं है टूटा
इस तंत्र से वह नहीं है रूठा

तो शायद मुझे
खुद बदलने की जरुरत है
और शायद उसने ही दिया
इसका मुहूर्त है।

1 comment:

Anonymous said...

Beautiful !! Very happy yo read this "BLOGGER" after longggg..