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Sunday, January 25, 2015

पड़ाव

मन के सवालों का जवाब कहाँ मिलता
की मंजिलों से पहले पड़ाव कहाँ मिलता।

हर पेड़ छिप गया है मकानों की चादरों में
परिंदों को अब शहरों में पड़ाव कहाँ मिलता।

वो कैदी जंगले से झांकता तो जरूर है मगर
सपने और हक़ीकत के परों का विसाल कहाँ मिलता।

बड़ा पाकदामन बतलाते हैं जमाने में उसे
दामन में उसके जले ठूंठों के सिवा कुछ नहीं मिलता।

ठहरकर सोचने की आदत भी भली होती वरना
तेज भागती जिंदगी में ठहराव कहाँ मिलता।

हम आज भी तकते उस हमनशीं का रास्ता
खुदा की नमाज में अब वह सुकून कहाँ मिलता। 

Friday, January 9, 2015

थपेड़े

फ़साने कई लिखे हैं लहरों ने थपेड़ों से 
मिटा मिटा कर साहिलों की रेत थपेड़ों से।

वो जरूर दरियाओं में पनाह मांगते होंगे 
वरना कब बचे हैं सितमगर थपेड़ों से। 

वो कहते मेरी खुशमिजाजी को मेरा बचपना मगर 
उन्हें नहीं पता हम बच ना पाये उम्र के थपेड़ों से।  

वो तो उनकी आशिकी को बेदाग़ रखना था वरना 
कमजोर  हम इतने भी नहीं की लहरें मिटा दे नाम थपेड़ों से।  

रहम मांगते फिरें शख्स वे सीपियों की दुकानों पर 
लहरों ने आ पटका है जिन्हें किनारों पर थपेड़ों से। 

आसान कहाँ है शायरी में मुकाम पाना 
शायरी की जमीन पर मिट जाते कई नाम जिंदगी के थपेड़ों से।  


Tuesday, November 18, 2014

धीरे धीरे

कब रुकी है जिंदगी की कहानी धीरे धीरे
बीत गयी कुछ बीतेगी बाकि जिंदगानी धीरे धीरे

काफिले कब तक चलेंगे ऊँटों के टखनों पर
वक्त आ गया है हौसलों के पंख लगाना धीरे धीरे

खौफ हवाओं में आज भी मौजूद है अंग्रेज बहादुर का
अरे इस बार तो आजादी लाना धीरे धीरे

कई रातों की नींद बाकि है आँखों में
शायद इस बार जुड़ जाये यह तंत्र जन से धीरे धीरे

हाथ उठा है दुआ में कबूल कर ऐ खुदा
वरना कोई यह न कहे तुझे हम भूल चुके धीरे धीरे

Saturday, November 1, 2014

मकां

इस तंग मकां में तेरा रहना हाय हाय
इससे बड़ा तो मेरा दिल हाय हाय

आशिकों की बस्ती में खुदा का भी एक मकां है मगर
दरवाजे पर चुनवाई किसने यह दीवार हाय हाय

पुराने दरख़्त हैं छाया तो देंगे मगर
किसे पता कब टूट कर बिखर जाये हाय हाय

मेरे चाहने वालों ने आवाजें कितनी लगायी मगर
हम जहाँ रहते हैं वहाँ उठी ख़ामोशी की बयार हाय हाय

आज खुश हुआ हूँ तो लिखता हूँ गजल  मगर
कलम से मेरी क्यूँ टपके है लहू हाय हाय

इधर मस्जिद टूटी उधर मैकदा फूटा
खुदा के दोनों ठिकाने इंसानों ने कैसा लूटा

शबे हिज्र में भी होता रहा बहरे खुदा फ़रियाद
हमसे यारों खुदा को किसने लूटा

था आगाज ऐसा की जीस्त ने खुदा पाया
अंजाम देख कर हाथों से पैमाना छूटा

हम आज भी करते हैं खुदा तुझे दिल से याद
पर इस चक्कर में हमसे जमाना रूठा

रफ्ता रफ्ता जमाने से ग़मगुसार घटते गये
इंकलाबियों के सैलाब थे बिन बारिश छंटते गये

मजलिस लगी है भीड़ भी बहुत है
वो इमारते नहीं गरीबों के झोपड़े हैं
हवा बहती गयी वे जलते गये

शमा हर रंग में जली है सहर होने तक ग़ालिब
पर कारवां थमता गया लोग घटते गये

कितना जोर आजमां रही हवाएं देखो
चिराग तो बुझा नहीं परवाने उड़ते गये

हम वह गुल नहीं जो बादे-नौ बहार का इन्तेजार करें
की मौसम बीतते गए हम खिलते गये

Monday, October 20, 2014

बरसों बाद उनका महफ़िल में उनका नाम आया
पतझड़ के पेड़ों में हरेपन का निशाँ आया

जब उड़ेलुं तेरे पैमाने से गले में शराब साकी
बने है दिल में ग़ज़ल होठों पर तेरा नाम आया

मैकशी में अब वह मजा कहाँ रहा
की जिसने आंखों से पी उसे मयखाना कहा काम आया

हम सबा से पूछते हैं  नामबर का पता
मेह्नत ये मेरी बस पत्ते खड़काने के काम आया

Thursday, October 16, 2014

जिंदगी का फ़साना है किसने किसको जाना है
हम ने तो अब तलक कहां खुद को पहचाना है

है सांस लेती जिंदगी आगोश में मेरी
मगर सुनता हूँ मौत का अलग पैमाना है

सियासत के रखवालों से कोई कैसे बचाये जम्हूरियत को
थपेड़ों में फसी कश्ती का कहा कोई ठिकाना है

रात की हथेली पर रखे अंगारों को ताकते रह गए
और कुछ नहीं बस उनकी सोहबत  नजराना है

Wednesday, October 15, 2014

जरुरत है

पुराने टूटे चश्मे से
झांकती दो पुरानी ऑंखें
मेज के उस पार वह बैठा
मेरी बातों को था गौर से सुन रहा
डर लगा मुझे जैसे
अपने अनुभव के तराजू से
मुझे था तौल रहा

कितनी अच्छी बातें की मैंने
गावों का समुचित विकास
रोजगार होगा लोगों के पास
प्रधानमन्त्री की जनधन
अब नहीं रह जायेगा कोई निर्धन

हर बात सुन
उसकी आँखों की चमक बढ़ती गयी
और पेशानी पर पड़ी लकीरें
धीरे धीरे घटती गयीं

आश्चर्य!

बीते सालों में उसने कितनों को सुना होगा
नयी बातें नए आश्वासन
कितनी ही बार भुना होगा
फिर भी आँखों की चमक बाकी है
कुछ  करने की ललक बाक़ी है
मेरे निराशावादी होने पर भी
वह कितनी आशाओं से भरा है
अपनी नहीं पर भावी पीढ़ी के
सुखद जीवन के अहसास से दबा है

इतने वर्षों के सरकारी थपेड़ों से
वह नहीं है टूटा
इस तंत्र से वह नहीं है रूठा

तो शायद मुझे
खुद बदलने की जरुरत है
और शायद उसने ही दिया
इसका मुहूर्त है।

कुछ बात बने

चले आओ की फिर कुछ बात बने
आँखों में रात बने दिल से दिल का साथ बने

विकास की लम्बी चादर लिए मैं खड़ा हूँ
अपने को करीब तो लाओ की कुछ बात बने

मेरी सच्चाई को समझने की कोशिश छोड़
खुद को समझ जाओ तो कोई बात बने

सडसठ सालों से रेंगते हुए मेरे पास न पहुंचे
जो कछुए की केंचुल उतारो तो कुछ बात बने

जितनी दूर रहोगे उतने खतरे में पाओगे खुद को
कहीं जनता का गुस्सा
कहीं नक्सलवादी
आतंकवादी या उग्रवादी
जो चादर में आ जाओ तो कुछ बात बने

हैं लोग सोये हो तुम भी सोये
अब भी जाग जाओ तो कुछ बात बने

मैं रूह तुम जिस्म मैं हकीकत तुम तिलस्म
जो मुझ में समां जाओ तो कुछ बात बने