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Thursday, February 5, 2009

शब्दों की शक्लें हर दिन बदल रही हैं
अंधेरों को रौशन कहने की की कोशिश चल रही है.

नैतिकता अनैतिकता आज एकताबद्ध हैं
एक दुसरे की गोद में परवरिश चल रही है.

उन्हें सिर्फ़ अपनी चिंता है दिन हो या रात
हम पे आंसूं बहने की साजिश चल रही है.

बड़े बुजूर्ग बतलाते हैं एक गाँव था कभी यहाँ
वीराने में आवाज लगाने की वर्जिश चल रही है

उनकी नज़रों में हमारा वजूद नहीं है नक्शे पे
उजालों में अंधेरों की कोशिश चल रही है.

चौराहे पर खड़े हैं पर हमें बतलाते रास्ता
आजकल उनके चिंतन की मालिश चल रही है.

झूठ बोल कर बेगुनाह साबित हो सकते हैं
कलयुगी धर्मराजों की महफ़िल सज रही है.

जो उनसे सच कहो, बुरा मान जाते हैं
साफ़- साफ़ कहने पे बंदिश चल रही है.

हर कोई अकेला ही सफर पे निकल पड़ा है
ठूंठ पेडों की पैदाइश निकल रही है.

1 comment:

Vinay said...

बधाई, अच्छा लिखा है